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कच्छ में 150 साल बाद दुर्लभ Afro-Asian Sand Snake का पहला पुष्ट रिकॉर्ड मिला

1872 के बाद गुजरात के कच्छ में इस सांप की प्रजाति को फिर से देखा गया, जो वन्यजीवों के दस्तावेजीकरण में एक महत्वपूर्ण खोज है।

झटपट समझें

कच्छ में 1872 के बाद पहली बार Afro-Asian Sand Snake (Psammophis schokari) का पुष्ट रिकॉर्ड मिला है, जो वन्यजीवों के दस्तावेजीकरण के लिए एक महत्वपूर्ण खोज है।

मुख्य बातें

  • कच्छ में 1872 के बाद पहली बार Afro-Asian Sand Snake का नया रिकॉर्ड मिला है।
  • वन विभाग के अधिकारी जयेश डुमाडिया ने काला डूंगर के पास सांप को देखा और दस्तावेजीकृत किया।
  • यह प्रजाति मुख्य रूप से शुष्क और अर्ध-शुष्क इलाकों में पाई जाती है।
  • Afro-Asian Sand Snake को मनुष्यों के लिए गंभीर खतरा नहीं माना जाता है।
  • वन विभाग इस sighting को वैज्ञानिक रूप से आगे दस्तावेजीकृत करने की तैयारी कर रहा है।
कच्छ में 150 साल बाद फिर दर्ज हुआ दुर्लभ Afro-Asian Sand Snake, 1872 के बाद मिला पहला पुष्ट रिकॉर्ड
वन विभाग के अधिकारी द्वारा दस्तावेजीकृत Afro-Asian Sand Snake की प्रजाति।

कच्छ: गुजरात के कच्छ में वन्यजीव दस्तावेजीकरण से जुड़ी एक महत्वपूर्ण खोज सामने आई है। वन विभाग के एक अधिकारी ने Afro-Asian Sand Snake (Psammophis schokari) को देखा और उसकी तस्वीरें व वीडियो दर्ज किए हैं। उपलब्ध ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार कच्छ क्षेत्र में इस प्रजाति का पिछला आधिकारिक दस्तावेजीकरण 1872 में हुआ था।

यह खोज कच्छ के काला डूंगर इलाके के पास नियमित गश्त के दौरान हुई। 32 वर्षीय Range Forest Officer जयेश डुमाडिया को पहले एक अन्य सांप दिखाई दिया। उसी दौरान उनकी नजर एक ऐसे सांप पर पड़ी जिसे उन्होंने क्षेत्र में पहले नहीं देखा था। उन्होंने उसे पकड़ने या नुकसान पहुंचाने के बजाय तस्वीरों और वीडियो के जरिए दस्तावेजीकृत किया। बाद में विशेषज्ञों ने इसकी पहचान Psammophis schokari के रूप में की।

इस रिकॉर्ड की खासियत केवल सांप का दुर्लभ दिखाई देना नहीं है। Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रजाति को कच्छ में आखिरी बार जीवाश्म विज्ञानी और प्रकृतिविद Ferdinand Stoliczka ने 1872 में दर्ज किया था। यानी लगभग डेढ़ सदी बाद क्षेत्र में इसकी मौजूदगी का नया पुष्ट रिकॉर्ड सामने आया है।

Afro-Asian Sand Snake मुख्य रूप से शुष्क और अर्ध-शुष्क इलाकों में पाया जाता है। इसका वितरण पश्चिम भारत से पाकिस्तान, ईरान और पश्चिम एशिया होते हुए अफ्रीका के कुछ हिस्सों तक माना जाता है। यह तेज गति से चलने वाला पतला सांप है और मुख्य रूप से छोटे जीवों का शिकार करता है।

प्रजाति को mildly venomous या rear-fanged snake माना जाता है, लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में यह मनुष्यों के लिए गंभीर खतरा नहीं माना जाता। किसी भी जंगली सांप की तरह इसे छूने या पकड़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

कच्छ के Conservator of Forests धीरज मित्तल ने भी इस sighting की पुष्टि की है। वन विभाग अब रिकॉर्ड को वैज्ञानिक रूप से आगे दस्तावेजीकृत करने की तैयारी कर रहा है और इसे research journal में प्रस्तुत किए जाने की योजना है।

कच्छ का शुष्क landscape नमक के मैदानों, घास के मैदानों, scrubland और रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र का मिश्रण है। लंबे अंतराल के बाद किसी प्रजाति का दोबारा दर्ज होना यह साबित नहीं करता कि उसकी आबादी बड़ी या स्थिर है; लेकिन यह संकेत जरूर देता है कि क्षेत्र की biodiversity में अभी ऐसी प्रजातियां मौजूद हो सकती हैं जिनका आधुनिक वैज्ञानिक documentation सीमित है।

इसलिए अगला महत्वपूर्ण कदम यह पता लगाना होगा कि यह केवल एक isolated sighting थी या कच्छ में Afro-Asian Sand Snake की कोई स्थायी आबादी मौजूद है।

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