नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामलों में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी पर रिश्वत मांगने का आरोप हो, तो उसकी जांच शुरू करने के लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत पहले से अनुमति लेना आवश्यक नहीं है।
अदालत ने कहा कि रिश्वत मांगना किसी लोक सेवक के आधिकारिक कर्तव्यों का हिस्सा नहीं है। इसलिए ऐसे आरोपों की जांच को रोकने के लिए सरकारी पद से जुड़ी कानूनी सुरक्षा का सहारा नहीं लिया जा सकता। यह फैसला 16 अक्टूबर को सुनाया गया था, जिसकी विस्तृत जानकारी 19 अक्टूबर को प्रमुख समाचार संस्थानों ने प्रकाशित की।
राजस्थान के पुलिसकर्मी की अपील खारिज न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने राजस्थान पुलिस के कांस्टेबल तेजाराम की अपील खारिज करते हुए यह निर्णय दिया।
तेजाराम पर पुलिस अधीक्षक के नाम पर 1.5 लाख रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप था। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत आरोप तय किए गए थे।
कांस्टेबल ने दलील दी थी कि जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी से अनुमति नहीं ली गई, इसलिए कार्यवाही कानूनी रूप से गलत है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और निचली अदालत में आरोप तय करने का आदेश बरकरार रखा।
धारा 17ए हर भ्रष्टाचार मामले में लागू नहीं अदालत ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए उन मामलों में पूर्व अनुमति का प्रावधान करती है, जिनमें कथित अपराध का संबंध लोक सेवक द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के दौरान की गई सिफारिश या लिए गए निर्णय से हो।
लेकिन रिश्वत मांगने जैसे कृत्यों को इस सुरक्षा के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता।
पीठ ने पुराने न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सरकारी पद का इस्तेमाल करके किया गया हर कार्य आधिकारिक कर्तव्य नहीं माना जा सकता।
जांच की अनुमति और मुकदमा चलाने की मंजूरी में अंतर इस निर्णय का अर्थ यह नहीं है कि भ्रष्टाचार के सभी मामलों में हर तरह की सरकारी अनुमति समाप्त हो गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने धारा 17ए के अंतर्गत जांच से पहले आवश्यक अनुमति और धारा 19 के अंतर्गत अभियोजन स्वीकृति को अलग-अलग कानूनी प्रावधान बताया।
तेजाराम के मामले में धारा 19 के तहत अभियोजन स्वीकृति बाद में प्राप्त कर ली गई थी। अदालत ने इस पहलू पर विचार करते हुए भी उनके खिलाफ मुकदमे की कार्यवाही जारी रखने का रास्ता साफ किया।
अदालत ने आरोपी को दोषी घोषित नहीं किया है। आरोप सही हैं या नहीं, इसका निर्णय मुकदमे में साक्ष्यों के आधार पर होगा।
भ्रष्टाचार की शिकायतों पर पड़ सकता है असर सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से रिश्वत मांगने के आरोपों की जांच में कानूनी स्थिति अधिक स्पष्ट हुई है।
इससे जांच एजेंसियों को उन मामलों में कार्रवाई आगे बढ़ाने में सहायता मिल सकती है, जहां आरोपी सरकारी कर्मचारी धारा 17ए के तहत पूर्व अनुमति नहीं मिलने का आधार लेकर जांच को चुनौती देता है।
हालांकि, शिकायत मिलने के बाद जांच और अभियोजन की अन्य कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना आवश्यक रहेगा।

