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यूजीसी नियमों की समीक्षा पर केंद्र का संकेत: सुप्रीम कोर्ट में समिति गठन पर विचार

उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव रोकने वाले 2026 के नियमों पर सरकार कर सकती है पुनर्विचार।

एक मेज के चारों ओर बैठे लोग चर्चा कर रहे हैं, जिसमें एक महिला नोट्स ले रही है।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यूजीसी के 2026 के नियमों की समीक्षा के लिए समिति बनाने का संकेत दिया है।
मुख्य बातें

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में संकेत दिया है कि वह विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए यूजीसी के 2026 के नियमों की समीक्षा के लिए एक समिति गठित करने पर विचार कर रही है। फिलहाल, 2012 के यूजीसी विनियम प्रभावी रहेंगे।

  • केंद्र सरकार यूजीसी के 2026 के नियमों की समीक्षा के लिए समिति बनाने पर विचार कर रही है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से नियमों पर पुनर्विचार करने को कहा, ताकि हर छात्र के हितों की सुरक्षा हो।
  • शीर्ष अदालत ने 29 जनवरी 2026 को नए नियमों के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी थी।
  • फिलहाल, उच्च शिक्षा संस्थानों में 2012 के यूजीसी विनियम लागू रहेंगे।
  • विनियम 3(1)(सी) में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को लेकर विवाद है।
  • नए नियमों की पृष्ठभूमि में रोहित वेमुला और पायल तडवी से जुड़े मामले भी हैं।

नई दिल्ली, 5 नवंबर 2026। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के 2026 के नियमों पर केंद्र सरकार दोबारा विचार कर सकती है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र ने बताया कि वह इन नियमों की समीक्षा के लिए एक समिति गठित करने पर विचार कर रहा है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि नई व्यवस्था में सभी विद्यार्थियों की चिंताओं और हितों का ध्यान रखा जाना चाहिए। हालांकि, समिति के गठन, उसकी सदस्यता और समीक्षा की समय-सीमा की औपचारिक घोषणा अभी नहीं हुई है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हर छात्र के हितों की सुरक्षा जरूरी

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने गुरुवार को यूजीसी के नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हुई। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे।

सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार से नियमों पर पुनर्विचार करने को कहा, ताकि उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रत्येक विद्यार्थी को सुरक्षा और समान अवसर मिल सकें।

सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि सरकार छात्रों की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए समिति बनाने की संभावना पर विचार कर रही है।

जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने लगाई थी रोक

यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता संवर्धन विनियम, 2026' अधिसूचित किए थे। इनका उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव तथा अन्य प्रकार के अनुचित व्यवहार को रोकने के लिए शिकायत निवारण व्यवस्था को मजबूत बनाना था।

नए नियमों के कुछ प्रावधानों पर आपत्तियां सामने आने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

29 जनवरी 2026 को शीर्ष अदालत ने नियमों की भाषा को प्रथम दृष्टया अस्पष्ट बताते हुए उनके क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी थी। अदालत ने निर्देश दिया था कि अगले आदेश तक 2012 के यूजीसी विनियम प्रभावी रहेंगे।

गुरुवार की सुनवाई के बाद भी यही अंतरिम स्थिति बनी हुई है।

किन प्रावधानों को लेकर विवाद है?

विवाद का प्रमुख केंद्र विनियम 3(1)(सी) है। इसमें जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के संदर्भ में दी गई है।

कुछ याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस परिभाषा में सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों और शिक्षकों को समान रूप से शामिल नहीं किया गया है। उन्होंने शिकायत निवारण व्यवस्था में सभी वर्गों के लिए स्पष्ट सुरक्षा की मांग की है।

हालांकि, नियमों की दूसरी परिभाषा में धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान और दिव्यांगता सहित विभिन्न आधारों पर भेदभाव को व्यापक रूप से शामिल किया गया है। अदालत के सामने इन दोनों प्रावधानों के बीच संबंध और उनकी व्यावहारिक स्पष्टता का प्रश्न भी है।

दूसरी ओर, वंचित समुदायों के विद्यार्थियों और सामाजिक संगठनों ने उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव के खिलाफ मजबूत संस्थागत सुरक्षा बनाए रखने पर जोर दिया है। कुछ समूहों ने नियमों को कमजोर करने के बजाय अधिक प्रभावी और समावेशी बनाने की मांग की है।

रैगिंग और छात्रावासों की व्यवस्था पर भी सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी में नियमों की समीक्षा करते समय केवल जातिगत भेदभाव की परिभाषा ही नहीं, बल्कि अन्य प्रावधानों पर भी महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए थे।

अदालत ने पूछा था कि रैगिंग को भेदभाव के विशिष्ट रूप के तौर पर शामिल नहीं करने का क्या असर पड़ेगा। इसी तरह छात्रावासों, कक्षाओं और शैक्षणिक समूहों में अलग-अलग व्यवस्थाओं से समानता के संवैधानिक सिद्धांतों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों की भी जांच जरूरी बताई गई थी।

इन प्रश्नों को नियमों की संवैधानिक वैधता पर चल रही न्यायिक समीक्षा का हिस्सा बनाया गया है।

रोहित वेमुला और पायल तडवी के मामलों से जुड़ी पृष्ठभूमि

नए विनियमों की पृष्ठभूमि में वर्ष 2019 की एक याचिका भी है, जिसे रोहित वेमुला और पायल तडवी की माताओं ने दाखिल किया था।

दोनों विद्यार्थियों की मौत के मामलों में जातिगत भेदभाव के आरोप सामने आए थे। याचिका में उच्च शिक्षा संस्थानों के भीतर भेदभाव रोकने और शिकायतों के प्रभावी निपटारे के लिए मजबूत व्यवस्था की मांग की गई थी।

इसके बाद यूजीसी ने नए नियमों का मसौदा तैयार किया और जनवरी 2026 में विनियम अधिसूचित किए। अब उनकी संवैधानिक वैधता और प्रावधानों की स्पष्टता पर न्यायिक विचार जारी है।

कॉलेजों और विश्वविद्यालयों पर अभी क्या असर होगा?

फिलहाल उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए 2012 के समानता संबंधी यूजीसी विनियम लागू रहेंगे। 2026 के नए नियम सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम रोक के कारण प्रभावी नहीं हैं।

सरकार समीक्षा समिति गठित करती है तो वह विभिन्न छात्र समूहों, शिक्षकों और अन्य हितधारकों की चिंताओं का अध्ययन कर सकती है। लेकिन उसकी वास्तविक जिम्मेदारियां गठन की आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होंगी।

इसलिए गुरुवार की सुनवाई को नए नियम लागू होने या पूरी तरह रद्द होने का फैसला नहीं माना जाना चाहिए। केंद्र सरकार ने अभी केवल पुनर्विचार और संभावित समिति गठन की बात कही है।

प्रकाशित: गुरुवार, 5 नवंबर 2026 | 8:21 PM IST

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