नई दिल्ली, 4 नवंबर 2026। सुप्रीम कोर्ट ने पंचायत और अन्य स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ने के लिए लागू दो बच्चों की शर्त की प्रासंगिकता पर महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। बुधवार को अदालत ने कहा कि भारत में प्रजनन दर घटने और जनसंख्या की संरचना बदलने के कारण दो से अधिक बच्चे होने पर उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराने वाले कानूनों के औचित्य पर दोबारा विचार करने की जरूरत है।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने इस मुद्दे को बड़ी बेंच के विचार के लिए भेजने का फैसला किया है। यह मामला स्थानीय निकाय चुनावों में उम्मीदवारों की पात्रता और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है।
2003 के फैसले की दोबारा समीक्षा का रास्ता खुला
वर्ष 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के उस प्रावधान की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी थी, जिसके तहत दो से अधिक जीवित बच्चों वाले व्यक्ति को स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से रोका जा सकता था।
अब अदालत ने माना है कि उस निर्णय के समय और वर्तमान जनसांख्यिकीय परिस्थितियों में बड़ा अंतर आ चुका है। इसी कारण पहले के फैसले में अपनाए गए तर्कों की पुनर्समीक्षा आवश्यक हो सकती है।
भारत की प्रजनन दर 3 से घटकर 1.9 हुई
सुप्रीम कोर्ट ने अपने विचार में देश की घटती कुल प्रजनन दर का विशेष उल्लेख किया।
अदालत के अनुसार, वर्ष 2003 में भारत की कुल प्रजनन दर लगभग 3 थी, जो अब घटकर 1.9 रह गई है। यह 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से कम है।
पीठ ने कहा कि यदि इस बदलाव को नजरअंदाज किया गया तो भविष्य में बुजुर्ग आबादी की बढ़ती हिस्सेदारी और कामकाजी उम्र के लोगों के अनुपात में गिरावट जैसी चुनौतियां सामने आ सकती हैं। हालांकि, कम प्रजनन दर का यह अर्थ नहीं है कि भारत की कुल आबादी अभी घटने लगी है।
महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच की याचिका से जुड़ा मामला
यह मामला महाराष्ट्र की काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले की याचिका से जुड़ा है। तीसरे बच्चे के जन्म के आधार पर उन्हें महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम के तहत अयोग्य ठहराया गया था।
उन्होंने इस निर्णय को अदालत में चुनौती दी। मामले पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह की अयोग्यता के संवैधानिक आधार और नागरिकों के लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के अधिकार के बीच संतुलन का सवाल उठाया।
अदालत ने यह चिंता भी जताई कि ऐसे प्रावधान नागरिकों को परिवार बढ़ाने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने के बीच चुनाव करने के लिए मजबूर कर सकते हैं। यह संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़े प्रजनन संबंधी स्वायत्तता के अधिकार का विषय भी है।
क्या अब दो से ज्यादा बच्चे वाले सभी लोग पंचायत चुनाव लड़ सकेंगे?
फिलहाल ऐसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और बड़ी बेंच को मामला भेजे जाने का अर्थ यह नहीं है कि देश के सभी संबंधित राज्य कानून तत्काल समाप्त हो गए हैं।
अलग-अलग राज्यों में लागू प्रावधानों की कानूनी स्थिति और भविष्य में बड़ी बेंच का फैसला महत्वपूर्ण होगा। अंतिम निर्णय के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि इस तरह की चुनावी अयोग्यता के नियमों में व्यापक बदलाव होगा या नहीं।
इस मामले का दूरगामी प्रभाव पंचायत चुनाव, स्थानीय लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों पर पड़ सकता है।
प्रकाशित: बुधवार, 4 नवंबर 2026 | 2:06 PM IST

