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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: हिरासत में लेते ही शुरू होगी 24 घंटे की गिनती

औपचारिक गिरफ्तारी का इंतजार नहीं, वास्तविक हिरासत से ही संवैधानिक समय-सीमा लागू।

अदालत के कमरे में एक घड़ी, कानून की किताब और न्याय का तराजू मेज पर रखा है।
यह फैसला गिरफ्तारी और हिरासत से जुड़े संवैधानिक अधिकारों को स्पष्ट करता है।
मुख्य बातें

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की समय-सीमा उस क्षण से शुरू होगी जब जांच एजेंसी उसे वास्तविक रूप से हिरासत में लेती है और उसकी स्वतंत्रता सीमित करती है। औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज होने का इंतजार नहीं किया जा सकता।

  • 24 घंटे की समय-सीमा वास्तविक हिरासत से शुरू होगी, औपचारिक गिरफ्तारी से नहीं।
  • जांच एजेंसियां गिरफ्तारी दर्ज करने में देरी करके संवैधानिक समय-सीमा को नहीं बढ़ा सकतीं।
  • यात्रा समय को छोड़कर, पूछताछ या दस्तावेज तैयार करने में लगा समय 24 घंटे की गणना से बाहर नहीं होगा।
  • यदि 24 घंटे की संवैधानिक सीमा का उल्लंघन होता है, तो व्यक्ति को तत्काल रिहा किया जाना चाहिए।
  • मजिस्ट्रेट को गिरफ्तारी के कागजात के बजाय वास्तविक हिरासत के समय की जांच करनी होगी।
  • यह फैसला हिरासत में हिंसा रोकने और न्यायिक निगरानी सुनिश्चित करने में मदद करेगा।

नई दिल्ली, 5 नवंबर 2026। सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और हिरासत से जुड़े संवैधानिक अधिकारों पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की समय-सीमा उस क्षण से शुरू होगी, जब जांच एजेंसी उसे वास्तविक रूप से हिरासत में लेकर उसकी स्वतंत्रता सीमित करती है। इसके लिए औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज होने का इंतजार नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने गुरुवार को कहा कि जांच एजेंसियां किसी व्यक्ति को पहले हिरासत में रखकर और बाद में गिरफ्तारी दर्ज करके संवैधानिक समय-सीमा को आगे नहीं बढ़ा सकतीं।

अदालत का यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत प्राप्त सुरक्षा से संबंधित है।

हिरासत और गिरफ्तारी के बीच कृत्रिम अंतर स्वीकार नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक अधिकारों के मामले में किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता वास्तव में कब सीमित हुई, यह सबसे महत्वपूर्ण है।

अदालत के अनुसार, पुलिस या दूसरी जांच एजेंसी किसी व्यक्ति को पूछताछ अथवा तलाशी के नाम पर अपनी निगरानी और नियंत्रण में रखकर उस अवधि को 24 घंटे की गणना से बाहर नहीं कर सकती।

यदि व्यक्ति को जाने की स्वतंत्रता नहीं है और वह प्रभावी रूप से जांच एजेंसी की हिरासत में है, तो इसी समय से संवैधानिक समय-सीमा की गणना होगी।

पीठ ने ऐसे किसी भी अतिरिक्त समय को असंवैधानिक बताया, जिसका उपयोग औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करने से पहले जांच के लिए किया जाए।

24 घंटे के नियम में केवल एक अपवाद

संविधान के अनुच्छेद 22(2) के अनुसार, गिरफ्तार और हिरासत में रखे गए व्यक्ति को निर्धारित समय के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस 24 घंटे की अवधि की गणना में केवल गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचने के लिए वास्तव में आवश्यक यात्रा समय को बाहर रखा जा सकता है।

पूछताछ, दस्तावेज तैयार करने, तलाशी की प्रक्रिया या गिरफ्तारी को औपचारिक रूप देने में लगा समय अतिरिक्त छूट का आधार नहीं बन सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि 24 घंटे की संवैधानिक सीमा का उल्लंघन होता है, तो संबंधित व्यक्ति को ऐसी गैरकानूनी हिरासत से तत्काल रिहा किया जाना चाहिए।

ड्रग्स मामले की सुनवाई के दौरान आया फैसला

यह निर्णय सुजीत दास बनाम भारत संघ मामले की सुनवाई के दौरान आया। मामला मादक पदार्थों की बरामदगी और नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) अधिनियम से संबंधित था।

अदालत के सामने रखे गए तथ्यों के अनुसार, संबंधित आरोपियों को 29 सितंबर 2025 को दोपहर करीब 2 बजे जांच दल ने अपने नियंत्रण में ले लिया था। हालांकि, उनकी औपचारिक गिरफ्तारी अगले दिन, 30 सितंबर को सुबह करीब 11 बजे दर्ज की गई।

आरोपियों को 30 सितंबर को शाम 4:45 बजे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। इस तरह वास्तविक हिरासत शुरू होने से पेशी तक 24 घंटे की संवैधानिक सीमा पार हो चुकी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी प्रक्रिया को असंवैधानिक पाया और संबंधित आरोपियों को तत्काल हिरासत से रिहा करने का आदेश दिया।

मजिस्ट्रेटों की जिम्मेदारी भी तय

फैसले में अदालत ने न्यायिक मजिस्ट्रेटों की भूमिका पर विशेष जोर दिया।

पीठ ने निर्देश दिया कि जब किसी आरोपी को पेश किया जाए, तो मजिस्ट्रेट को केवल गिरफ्तारी के कागजात में दर्ज समय पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उसे यह भी दर्ज करना होगा कि व्यक्ति की स्वतंत्रता वास्तव में किस तारीख और समय से सीमित हुई थी।

इसके बाद मजिस्ट्रेट को जांचना होगा कि 24 घंटे की सीमा का पालन हुआ है या नहीं।

अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 58 का उल्लेख करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि 24 घंटे के भीतर की हिरासत भी परिस्थितियों के अनुसार उचित अवधि की होनी चाहिए। यदि हिरासत अनुचित रूप से लंबी है, तो मजिस्ट्रेट न्यायिक रिमांड देने से इनकार कर सकता है।

हिरासत में हिंसा रोकना भी फैसले का उद्देश्य

सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति को औपचारिक गिरफ्तारी दिखाए बिना लंबे समय तक हिरासत में रखना अधिकारों के दुरुपयोग की आशंका पैदा करता है।

अदालत ने हिरासत में हिंसा की समस्या का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायिक निगरानी शुरू होने से पहले व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित रखने की व्यवस्था स्वीकार्य नहीं हो सकती।

पीठ ने ओडिशा, मद्रास और केरल उच्च न्यायालयों के उन पूर्व निर्णयों से भी असहमति जताई, जिनमें औपचारिक गिरफ्तारी से पहले की हिरासत को 24 घंटे की गणना से बाहर रखने की अनुमति दी गई थी।

आम नागरिकों के लिए फैसले का क्या महत्व है?

इस निर्णय से एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट हुई है: किसी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकार केवल इस बात पर निर्भर नहीं होंगे कि पुलिस ने गिरफ्तारी का समय कागजों में कब दर्ज किया।

यदि कोई व्यक्ति वास्तविक रूप से हिरासत में है, तो उसके अधिकारों की सुरक्षा उसी क्षण से लागू होगी।

हालांकि, यह फैसला जांच एजेंसियों की वैध गिरफ्तारी की शक्ति समाप्त नहीं करता। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गिरफ्तारी और हिरासत की प्रक्रिया संविधान के अनुरूप हो तथा न्यायिक निगरानी में अनावश्यक देरी न की जाए।

प्रकाशित: गुरुवार, 5 नवंबर 2026 | 1:47 PM IST

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