नई दिल्ली, 4 नवंबर 2026। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये पर आने वाले महीनों में फिर दबाव बढ़ सकता है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स के 37 विदेशी मुद्रा विशेषज्ञों के नए सर्वेक्षण के अनुसार, रुपया जनवरी 2027 के अंत तक 96 और अप्रैल 2027 के अंत तक 96.33 प्रति डॉलर के स्तर तक कमजोर हो सकता है।
बुधवार, 4 नवंबर को जारी सर्वेक्षण में विशेषज्ञों ने आशंका जताई कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, विदेशी निवेशकों की पूंजी निकासी और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियां भारतीय मुद्रा पर दबाव बनाए रख सकती हैं। हालांकि, ये अनुमान हैं, रुपये की भविष्य की विनिमय दर का निश्चित परिणाम नहीं।
अगले छह महीनों के लिए क्या हैं अनुमान?
रॉयटर्स ने 2 से 4 नवंबर के बीच 37 मुद्रा बाजार विशेषज्ञों की राय ली। सर्वेक्षण में सामने आए प्रमुख आंकड़े इस प्रकार हैं।
सर्वेक्षण के अनुसार, बैंक ऑफ अमेरिका ने अगले 12 महीनों में रुपये के 99 प्रति डॉलर तक कमजोर होने का अनुमान बरकरार रखा है। हालांकि, किसी भी सर्वेक्षण प्रतिभागी ने डॉलर के मुकाबले रुपया 100 के पार जाने का अनुमान नहीं जताया।
आज मजबूत हुआ रुपया, फिर गिरावट की आशंका क्यों?
बुधवार को शुरुआती कारोबार में रुपया करीब दो सप्ताह के उच्चतम स्तर 94.51 प्रति डॉलर तक पहुंच गया था। बाद में यह लगभग 94.63 पर कारोबार कर रहा था।
अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के परिणामों के बाद डॉलर में आई कमजोरी और विदेशी निवेशकों की भारतीय शेयर बाजार में खरीदारी के संकेतों से रुपये को अस्थायी समर्थन मिला।
लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह राहत टिकाऊ साबित हो, इसके लिए विदेशी पूंजी प्रवाह में निरंतर सुधार और कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता आवश्यक होगी।
विदेशी निवेश और महंगे कच्चे तेल का दबाव
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। तेल महंगा होने पर विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ सकती है, जिससे रुपये पर दबाव पड़ता है।
इसके अलावा विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की लगातार बिकवाली भी मुद्रा बाजार को प्रभावित करती है। रॉयटर्स के मुताबिक, इस वर्ष रुपये के मूल्य में लगभग पांच प्रतिशत की गिरावट दर्ज हो चुकी है।
रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप करता रहा है। रॉयटर्स के अनुसार, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 719.75 अरब डॉलर था, जबकि केंद्रीय बैंक की आगे की डॉलर देनदारियां भी काफी बढ़ी हुई थीं।
आम लोगों पर क्या असर पड़ सकता है?
रुपये में कमजोरी आने पर विदेश में पढ़ाई, अंतरराष्ट्रीय यात्रा, डॉलर में भुगतान और आयातित वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है। कच्चे तेल के आयात का खर्च बढ़ने से घरेलू महंगाई पर भी दबाव पड़ने की आशंका रहती है।
दूसरी ओर, विदेशों से डॉलर में भुगतान प्राप्त करने वाले निर्यातकों और कुछ सेवा प्रदाताओं को रुपये में अधिक राशि मिल सकती है। हालांकि, वास्तविक लाभ विनिमय दर, लागत और अनुबंधों पर निर्भर करेगा।
आने वाले महीनों में रुपये की दिशा अमेरिकी डॉलर, कच्चे तेल की कीमतों, भारतीय रिजर्व बैंक की नीतियों और विदेशी निवेशकों के रुख से तय होगी।
प्रकाशित: बुधवार, 4 नवंबर 2026 | 5:39 PM IST

