नई दिल्ली, 6 नवंबर 2026। सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पुलिस हिरासत से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी आरोपी को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की संवैधानिक समय-सीमा उसकी औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज होने से नहीं, बल्कि उसे वास्तव में हिरासत में लेने के समय से शुरू होगी।
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने 5 नवंबर को दिए फैसले में कहा कि जांच एजेंसियां पूछताछ, तलाशी या जब्ती की प्रक्रिया के नाम पर किसी व्यक्ति को हिरासत में रखकर गिरफ्तारी का समय बाद में दर्ज करने के जरिए संवैधानिक समय-सीमा नहीं बढ़ा सकतीं।
यह निर्णय सुजीत दास एवं अन्य बनाम भारत संघ मामले में दिया गया है।
हिरासत में लेने के समय से शुरू होगी 24 घंटे की गणना
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22(2) के अनुसार, गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना आवश्यक है। इस अवधि में मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचने के लिए जरूरी यात्रा समय शामिल नहीं किया जाता।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस संवैधानिक सुरक्षा को लागू करने के लिए वास्तविक हिरासत का समय महत्वपूर्ण है।
यदि जांच एजेंसी ने किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता प्रतिबंधित कर दी है और वह उसके नियंत्रण में है, तो केवल गिरफ्तारी का दस्तावेज बाद में तैयार होने से 24 घंटे की गणना आगे नहीं बढ़ेगी।
अदालत के अनुसार, जांच प्रक्रिया के लिए संविधान से अलग कोई अतिरिक्त हिरासत अवधि नहीं बनाई जा सकती।
ड्रग्स तस्करी के मामले से जुड़ा है फैसला
यह विवाद त्रिपुरा में मादक पदार्थों की कथित तस्करी से संबंधित मामले में सामने आया।
जांच एजेंसी ने 29 सितंबर 2025 को दोपहर करीब 2 बजे चार व्यक्तियों को रोका था। हालांकि, उनकी औपचारिक गिरफ्तारी अगले दिन, 30 सितंबर को सुबह लगभग 11 बजे दर्ज की गई।
आरोपियों को उसी दिन शाम 4:45 बजे न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया।
बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोपी वास्तविक रूप से पिछले दिन दोपहर से जांच एजेंसी की हिरासत में थे। इसलिए मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने तक 24 घंटे की संवैधानिक सीमा समाप्त हो चुकी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए हिरासत की अवधि को असंवैधानिक पाया।
तीन आरोपियों की जमानत का रास्ता साफ
शीर्ष अदालत ने त्रिपुरा हाईकोर्ट के 29 अप्रैल 2026 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें तीन अपीलकर्ताओं की नियमित जमानत अर्जियां खारिज हुई थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि तीनों अपीलकर्ताओं को अधिकतम सात दिनों के भीतर संबंधित विशेष अदालत के सामने पेश किया जाए, जिसके बाद उचित शर्तों पर उन्हें जमानत पर रिहा किया जाए।
ध्यान देने वाली बात है कि मामले में चार व्यक्तियों को हिरासत में लिया गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की इस अपील में तीन आरोपी शामिल थे। जमानत संबंधी आदेश इन्हीं तीन अपीलकर्ताओं के लिए दिया गया है।
मजिस्ट्रेट को दर्ज करना होगा वास्तविक हिरासत का समय
सुप्रीम कोर्ट ने मजिस्ट्रेटों की जिम्मेदारी भी स्पष्ट की है। आरोपी को अदालत में पेश किए जाने पर मजिस्ट्रेट को उसके वास्तविक हिरासत में लिए जाने की तारीख और समय दर्ज करना होगा।
साथ ही यह जांचना होगा कि 24 घंटे की निर्धारित सीमा का पालन किया गया है या नहीं।
अदालत ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 58 के अनुसार, 24 घंटे की सीमा के भीतर भी हिरासत की अवधि परिस्थितियों के मुताबिक उचित होनी चाहिए। यदि वह अनुचित रूप से लंबी है तो मजिस्ट्रेट रिमांड देने से इनकार कर सकते हैं।
संवैधानिक समय-सीमा का उल्लंघन होने पर अदालत ने संबंधित व्यक्ति को हिरासत से तत्काल रिहा करने का सिद्धांत भी दोहराया।
तीन हाईकोर्ट के फैसलों से सुप्रीम कोर्ट की असहमति
सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा, मद्रास और केरल हाईकोर्ट के उन पूर्व निर्णयों को भी सही कानूनी स्थिति नहीं माना, जिनमें कुछ जांच प्रक्रियाओं के दौरान वास्तविक हिरासत और औपचारिक गिरफ्तारी के बीच अंतर स्वीकार किया गया था।
शीर्ष अदालत के मुताबिक, संविधान में उपलब्ध व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा को ऐसी व्याख्या से कमजोर नहीं किया जा सकता।
अदालत ने फैसले की प्रति राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों, हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरलों और राज्य न्यायिक अकादमियों के निदेशकों को भेजने की भी व्यवस्था की है।
आम नागरिकों के लिए फैसले का क्या महत्व?
इस फैसले का असर पुलिस और अन्य जांच एजेंसियों की गिरफ्तारी तथा हिरासत संबंधी प्रक्रियाओं पर पड़ सकता है।
इसका मतलब यह है कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता कब से प्रतिबंधित हुई, यह न्यायिक जांच का महत्वपूर्ण प्रश्न बनेगा। पुलिस रिकॉर्ड में बाद का गिरफ्तारी समय दर्ज कर देने से पहले की वास्तविक हिरासत स्वतः वैध नहीं हो जाएगी।
हालांकि, इस निर्णय का अर्थ यह नहीं है कि 24 घंटे के बाद हर आरोपी को सभी परिस्थितियों में बिना शर्त रिहा करना होगा। कानूनी प्रक्रिया, न्यायिक आदेश और विशिष्ट संवैधानिक अपवाद भी लागू हो सकते हैं। निवारक निरोध के मामलों पर अनुच्छेद 22 में अलग प्रावधान हैं।
यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक सुरक्षा को मजबूत करने और हिरासत की अवधि पर न्यायिक निगरानी सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रकाशित: शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 | 2:40 PM IST

