नई दिल्ली: देश में बिजली की ऊंची मांग के बीच कोयले से चलने वाले बिजलीघरों के ईंधन भंडार पर दबाव बढ़ गया है। Central Electricity Authority के ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत के लगभग 40 प्रतिशत कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में कोयले का स्टॉक गंभीर रूप से कम हो गया है। 19 सितंबर तक ऐसे संयंत्रों की संख्या बढ़कर 74 पहुंच गई, जो एक सप्ताह पहले करीब 60 थी।
CEA के मानकों के अनुसार जिन संयंत्रों के पास निर्धारित आवश्यकता का 25 प्रतिशत से कम कोयला बचा है या जिनका उपलब्ध भंडार तीन दिन से कम समय तक बिजली उत्पादन के लिए पर्याप्त है, उन्हें गंभीर स्थिति वाली श्रेणी में रखा जाता है। 17 सितंबर को ऐसे संयंत्रों की संख्या 72 थी, जो दो दिन बाद बढ़कर 74 हो गई।
इस दबाव के पीछे बिजली की मजबूत मांग और कोयले की ढुलाई में आई बाधाओं का संयुक्त असर बताया जा रहा है। पिछले एक सप्ताह में भारत की अधिकतम बिजली मांग 230 से 250 गीगावाट के बीच बनी हुई है। मई में देश की पीक बिजली मांग रिकॉर्ड 270.70 गीगावाट तक पहुंची थी।
अनियमित मानसूनी बारिश ने प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्रों में खनन और परिवहन को प्रभावित किया था। इसके बाद कोयला और रेल मंत्रालय ने बिजलीघरों तक आपूर्ति बढ़ाने के उपाय शुरू किए। सितंबर के शुरुआती दिनों में बिजली क्षेत्र के लिए रेलवे रैक लोडिंग 370 रैक प्रतिदिन से बढ़ाकर 444 तक पहुंचाई गई थी।
हालांकि मौजूदा स्थिति को तत्काल राष्ट्रव्यापी बिजली संकट के रूप में देखना सही नहीं होगा। रेटिंग एजेंसी Crisil के विश्लेषकों के अनुसार भंडार में आई गिरावट मुख्य रूप से अस्थायी लॉजिस्टिक समस्या प्रतीत होती है, न कि देश में कोयले की संरचनात्मक कमी। कोल इंडिया के खदान क्षेत्रों में पर्याप्त भंडार उपलब्ध होने के बावजूद उसे समय पर बिजलीघरों तक पहुंचाना प्रमुख चुनौती बनी हुई है।
दूसरी ओर गर्म मौसम और अपेक्षाकृत कमजोर जलविद्युत उत्पादन के कारण बिजली कंपनियों को आयातित कोयले का सहारा भी बढ़ाना पड़ा है। अगस्त में भारतीय बिजली उत्पादकों का कोयला आयात 15 महीने के उच्चतम स्तर 5.52 मिलियन टन पर पहुंच गया था, जो एक साल पहले की तुलना में करीब 86 प्रतिशत अधिक था।
अप्रैल से अगस्त के दौरान नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में करीब 21 प्रतिशत वृद्धि के बावजूद चौबीसों घंटे बिजली आपूर्ति बनाए रखने में कोयला आधारित संयंत्रों की भूमिका अभी भी महत्वपूर्ण है। ऐसे में अगले कुछ दिनों में कोयले की ढुलाई और बिजली मांग का स्तर यह तय करेगा कि संयंत्रों के भंडार कितनी तेजी से सामान्य स्थिति में लौटते हैं।

